Saturday, 21 September 2013

Why do we shed themselves


हम क्यों स्वयं को गिराते है

आज के परिवेश को देख कर मन में बड़ी पीड़ा हो रही है मन बार - बार यही प्रश्न करता है कि हम क्यों स्वयं को गिराते है । आज हर व्यक्ति चाहे वो साधारण इंसान कहलाने वाला एक किसान या मजदूर हो या फिर एक उच्च वर्ग को सम्बोधित करने वाला एक प्रतिष्ठित business men या कोई नेता या फिर यूँ कहे अपने समाज को चलाने वाले धर्म guru धर्माचार्य सब के सब आचरण और व्यवहार से निम्न श्रेणी में आ खड़े हुए हैं ।
आज अपने को सभ्य और अनुकरणीय मानने वाले लोगों का ही जीवन छलावे से भरा – पूरा है ये आज समाज में रह कर समाज को उसी प्रकार लुट रहे हैं जैसे दीमक लकड़ी में रह कर लकड़ी को खोखला करती है।
ऐसे ही आज साधु के वेश में समाज को लूटने वाले ये समाज के पुरोधा अपने ही समाज जिसको वो अपना परिवार कहते हैं उसे लुटेरों कि तरह लुट रहें हैं । हमारे देश पर न जाने कितनी बार लुटेरों ने हमला किया और उसे लूटा पर जिस तरह आज अपना देश लुट रहा है अपने ही देश के रक्षकों से उस तरह तो अपना देश कभी नहीं लुटा।
कभी कभी मेरे दिल में ये ख्याल आता है कि ये ऐसा क्यों करते हैं कहाँ है इस की जड़ें... कोण से पेड़ इन को चाय देते आहे जो ये इतने पनप रहें है की इनकी आत्मा को जरा सा भी खोफ कानून का या परमात्मा का नहीं है कि इनको भी कभी दंड मिलेगा । इनको दुराचरण में आनंद और सदा चरण में दुःख कि अनुभूति इसीलिए होती है कि ये जानते है कि इन्हें इनके कर्मों का दंड नहीं मिलेगा। जनता- समाज को इन लोगों ने अपने मोह- पाश में जो बाँध रखा है ।
इस सृष्टि कि रचना करने वाले राजा कि सबसे बड़ी संतान कहलाने वाले हम मानव है और मानव को उसके इस साम्राज्य का राजकुमार माना जाता है। मानव के मजबूत कंधे पर ही इस सृष्टि के संचालन करने की शक्ति है, फिर इस शक्ति का उपयोग सबके हित में करने कि बजाय थोड़े से स्वार्थ हित और छडिक सुख के लिए मानव दुराचारी बन कर स्वयं को क्यों गिरता है।
सदाचारी जीवन सदैव उन्नति का दौतक है इसके दवारा ही समाज में श्रेष्ठ प्रतिको कि स्थापना हो सकती है; जिससे इस समाज और समाज में रहने वाले हर स्त्री – पुरुष अपने को सुरक्षित कर सकते है और साथ ही उन्नति व प्रगति की नयी राहे बना सकते हैं।
एक गलत कार्य करने वाला  ये सोचता है कि उसे कोई जन नहीं पायेगा, समाज या कानून भी उनको सजा नहीं दे पायेगा क्यों कि वो ऐसा अपने आस पास आवरण तैयार रखते है जिससे वो बाख जायेंगे और ये सच भी है की वो बच जाते है ;पर क्या वो God की नजर से बाख पायेंगे या अपनी अंतर आत्मा से। एक दुराचारी आत्मग्लानी की पीड़ा से पीड़ित एवं उद्धेलित रहता है। वही पर एक सदाचारी का जीवन सदैव आत्म संतोष से सराबोर रहता है ।
गर हम अपने समाज को पतन से व अपराध से मुक्त करना चाहते हैं तो हमे अपने समाज में श्रेष्ठ विचारों व व्यवहार का आचरण उतरना होगा। एक सदाचारी का जीवन सदैव आत्म संतोष से सराबोर रहता है । केवल पीले, सफ़ेद व गेहुए वस्त्र पहनकर समाज को ठगना नहीं है बल्कि सही मायने में स्वेत - स्वच्छ, निर्मल विचारों को सबके हृदय में देव मूर्ति कि तरह स्थापित करना होगा तभी हम अपने समाज को गिरने से बचा सकते है और गर्व से कह सकते है की हम उस देश के वासी हैं जहाँ कभी राम का राज्य था । हम में मर्यादा है । सदाचरण है। हम उन्नत विश्व के रचना कार है । हम भारत के वासी हैं ।     

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